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लेखन में हो कामना और अभिव्यक्ति - योजना रावत

सिलीगुड़ी। सृजन अपने आप में एक संवाद है। लेखन में कामना व अभिव्यक्ति होनी चाहिए। लेखन के माध्यम से सृजन एक प्रकिया है। जीवन अनुभव है लेकिन कविता में अभिव्यक्ति व शिल्प का सम्मिश्रण होना चाहिए। यह बातें पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रो. डॉ. योजना रावत ने कहीं। वह सृजन और संवाद विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहीं थीं। उन्होंने स्वयं की लिखी पै-पैकेज कहानी के मुख्य अंशो की चर्चा भी की। कहानी में मध्यमवर्गीय समाज में अनिवार्य पड़ाव को संवरते-बिखरते वर्णित किया गया है। परिचर्चा में विभिन्न साहित्यप्रेमियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। देवेंद्र नाथ शुक्ल ने कहा कि सृजन के साथ संवाद अनिवार्य रूप से जुड़ा होना चाहिए। मौलिकता इसका अनिवार्य तत्व है। वहीं ओमप्रकाश पांडेय ने कहा कि जिस अनुपात में सृजन हो रहा है, उस अनुपात में संवाद नहीं है।
संगोष्ठी में सत्येन बनर्जी ने खेल चलता ही रहेगा गजल प्रस्तुत की। राजभाषा पदाधिकारी राजेश चतुर्वेदी ने सृजन और संवाद के संदर्भ में इंटरनेट के महत्व को बताया। श्याम सुंदर अग्रवाल ने कविता जख्म हो ना हो जिगर चाहिए का पाठ किया। छात्रा रजनी भगत ने स्वयं की लिखी कविता सुनाई। मंजू अग्रवाल ने 'कुछ दिनों पहले तो कहते थे' कविता का पाठ किया। कार्यक्रम में करणसिंह जैन ने अपनी रचना से अवगत कराया। परिचर्चा व कविगोष्ठी में मुन्ना लाल, श्यामसुंदर शर्मा व रंजना श्रीवास्तव ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम महावीर चचान की अध्यक्षता में हुआ। सचिव अरूण मिश्र ने अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।
(साभार - जागरण )

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