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राष्ट्रगान की धुन के रचयिता राम सिंह ठकुरी

दीपक राई
हम सभी भारतवासियों के लिए राष्ट्रगान के लिए मन में बहुत आदर और सामान का भाव है लेकिन शायद आपको मालूम नहीं होगा कि इसकी धुन गोरखा मूल के व्यक्ति ने तैयार की थी । देशभक्ती की मिसाल पेश करती इस राष्ट्रगान के धुन बनाने वाले व्यक्ति के जीवन को जाने । भारत ने स्वतंत्र आन्दोलन में कई इसे वीर सपूत देखे जिन्होंने अपनी भारतमाता के लिए अपने जीवन को सहर्ष समर्पित कर दियाइसे ही एक वीर गोरखा नायक जिन्होंने भारतीय आज़ादी के परचम को लहराया, साथ ही इस वीर सैनिक ने भारत में प्रचलित राष्ट्रगान और अन्य गीत जैसे "कदम-कदम बढाए जा ", शुभ सुख चैन " की धुन तैयार की । उस वीर भारतीय गोरखा व्यक्ति का नाम कैप्टन राम सिंह ठकुरी है । ठकुरी का जन्म उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव खान्यारा में हुआ था जो उस समय पंजाब सूबे के धर्मशाला के पास स्थित है । 15 अगस्त 1914 को जन्मे राम सिंह के पिताजी एक गोरखा सैनिक थे जिसका गहरा असर बचपन से उनके जीवन में पड़ा और सेना के जुनून के चलते वह 1st गोरखा राईफल्स के बैंड में जुड़ गए गए . राम सिंह को संगीत से गहरा लगाव था जो उन्हें अपने दादा जमनी चाँद से मिला था , 1890 के आसपास उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से हिमाचल आकर बस गए थे।
सेना में रहते हुए इन्होने शास्त्रित और पश्चिमी संगीत की विधिवत शिक्षा ली और साथ ही बलाद , स्ट्रिंग बैंड ,नृत्य बैंड में भी पारंगत प्रशिक्षण प्राप्त किया । खईबर-पख्तुन्ख्वा के 1937-1939 के युद्ध के दौरान राम सिंह के शौर्य के प्रसन्न ब्रिटिश सरकार ने इन्हें किंग जार्ज VI मेडल के सम्मानित किया , इसी वीरता के लिए उन्हें सन 1941 में पदोन्नत करके कंपनी हवलदार मेजर बना दिया गया। ब्रिटिश सेना की ओर से उन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध में सिंगापुर और मलय के युद्धक्षेत्र में भेजा गया। जापानी सेना से सिंगापुर गंवाने के बाद जापानी लोगों ने भारी संख्या में युद्धबंदी शिविर बना लिए थे , वहा से नए जोश के साथ सही मायने के लिए लड़ने के जज्बे के साथ वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से मिले और उनसे प्रभावित होकर आज़ाद हिंद फौज में सम्मिलित हो गए। बोस के नेतृत्व में राम सिंह ने अनेको कौमी तरानों की धुन बनायी जैसे कदम-कदम बढ़ाते चलो , शुभ सुख चैन । आज़ाद हिंद फौज ने उनके द्वारा तैयार राष्ट्रगान को आधिकारिक रूप से अपना लिया , अपने बेमिसाल योगदान के द्वारा स्वयं सुभाष चन्द्र बोस ने राम सिंह को एक वायलिन और सेक्सोफोन उपहार दिए थे . विश्युद्ध की समाप्ती के बाद आज़ाद हिंद फौज ने रंगून में समर्पण कर दिया , बड़ी बनाए गए सभी सैनिको को काबुल लाईन्स नई दिल्ली की छावनी में लाया गया जहां राम सिंह और अन्य बंधको को बिना किसी शर्त के छोड़ दिया गया ।
बाद में जब भारत आज़ाद हुआ तो राम सिंह और उनकी आर्केस्ट्रा टीम को लाल किले में प्रधानमंत्री के देश को संबोधन के मौके पर राष्ट्रगान बजाने के लिए आमंत्रित किया गया था .अपनी लम्बी सेवा के बाद सन 1948 को फिर से तीसरी बटालियन में भर्ती होने के बाद उन्होंने 1974 तक कार्य करते रहे , उन्हें DSP के मानद पद पर रिटायर किया गया । केन्द्रीय सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और सिक्किम सरकार ने भी बाद के सालो में राम सिंह को सम्मानित किया . राम सिंह के जीवन के आखिर के दिनों में वह बहुत सारे विवादों में शामिल हुए , उनपर राष्ट्रगान की धुन नक़ल करने का आरोप भी लगा। इसके बाद राम सिंह ने केंद्र से अपने स्वाधीनता सेनानी का तमगा वापस लौटा दिया जिसके कारण उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सारी सुविधा और पुरूस्कार स्वरुप राशि वापस मांगे पर भी काफी बवाल मचा। लम्बी बीमारी के बाद सन 15 अप्रैल 2002 को इस वीर सपूत ने अंतिम सांस ली।

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