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..तब तो पत्थर पर आते थे विश्व शिल्पी

दार्जिलिंग। बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है। गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा प्रमुख दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद के चेयरमैन सुभाष घीसिंग के जमाने की बात है। उन्होंने फरमान जारी कर दिया था कि कोई भी मिट्टी की प्रतिमा लाई जाएगी और ही इसकी पूजा होगी। भक्त उदास मन से जहां-तहां पत्थरों पर ही आदि शिल्पी की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा-अर्चना करते थे। यही हाल दुर्गा पूजा में भी होता था और इतना उल्लास का माहौल भी नहीं दिखाई देता था। झांकियों के निकालने बैंड-बाजे प्रतिबंधित कर दिये गए थे। सही मायने में कहा जाए तो वह दौर पहाड़ के लोगों के लिए बहुत बुरा हुआ करता था। भक्तों के पास निराश होने के अलावा कोई चारा नहीं था। पत्थर रखकर पूजा की जाती थी और प्रसाद जैसे-तैसे चढ़ाए जाते थे। इसको लेकर लोगों में आक्रोश भी था, लेकिन कई दिनों तक वह मजबूर थे। उस समय गोरामुमो सुभाष घीसिंग का ही हिल्स में जलवा था। कुछ लोगों ने विरोध भी किया, लेकिन यह दबकर रह गया।

उस दौर को अब भी लोग पत्थर युग के नाम से जानते हैं और याद करने के बाद गोरामुमो प्रमुख को कोसते हैं। कुछ वर्षो बाद समय बदला और गोजमुमो का उदय हुआ। गोजमुमो गोरामुमो के विवाद के कारण घीसिंग को पहाड़ छोड़ना पड़ा और लोगों ने फिर मूर्ति पूजा शुरू कर दी। वर्ष 2007 के बाद यह क्रम बना हुआ है। इसका श्रेय कई लोग गोजमुमो को देते हैं। चौरस्ता के पास रहने वाले सुरेश केशरीउन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि सुभाष घीसिंग ने तुगलकी फरमान जारी कर दिया था, लेकिन कोई विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। लेकिन बुरे काम का नतीजा भी बुरा होता है। इस समय सुभाष घीसिंग का बुरा समय चल रहा है। देवी-देवताओं के मूर्ति पूजा पर किसी तरह का प्रतिबंध लगाना उचित नहीं था। इस बीच शनिवार को विश्वकर्मा पूजा को लेकर लोगों में उल्लास है और पंडालों में मूर्ति स्थापित करने का सिलसिला जारी रहा।

(साभार - जागरण)

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