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वीर गोरखा शहीद दुर्गा मल्ल - आजाद हिन्द फौज के प्रथम शहीद

जन्म- 1913 ई., बलिदान- 25 अगस्त, 1944 ई. बलिदान दिवस (25 अगस्त) पर विशेष

शहीद दुर्गा मल्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के देहरादून (अब उत्तरांचल) जिले में डोईवाला नामक गांव में सन् 1913 में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गंगाराम मल्ल और माता का नाम श्रीमती पार्वती देवी मल्ल था। दुर्गा मल्ल बाल्यकाल से ही गांव के अन्य लड़कों से भिन्न दिखाई देते थे। माता-पिता के आज्ञाकारी, पढ़ने और खेलकूद के शौकीन। उन्हें अपने गोरखा समाज की दुर्दशा देखकर दु:ख होता था। उन दिनों गोरखा समाज की स्थिति ठीक नहीं थी। दुर्गा मल्ल विद्यार्थी जीवन से ही पराधीन भारत के प्रति व्यथित रहते थे। अत: विद्यार्थी जीवन में ही स्वाधीनता संग्राम में शामिल हो गए थे। उनके आदर्श थे ठाकुर चन्दन सिंह, वीर खड्ग बहादुर सिंह बिष्ट, पंडित ईश्वरनन्द गोरखा, अमर सिंह थापा इत्यादि। उन पर गांधीवादी स्वतंत्रता संग्रामियों का भी प्रभाव था। गोरी सरकार का दमनचक्र स्वतंत्रता संग्रामियों पर तेजी से होने लगा था। अत: सभी आंदोलनकर्ता पुलिस की आंखों में धूल झोंककर देहरादून छोड़कर अन्य स्थानों पर चले गए।

दुर्गा मल्ल भी अपने रिश्तेदार के यहां धर्मशाला चले गए, इस कारण दुर्गा मल्ल की पढ़ाई छूट गई। कुछ समय पश्चात् वे सन् 1931 में स्थानीय पलटन 2/1 गोरखा राइफल्स में भर्ती हो गए। तब दुर्गा मल्ल केवल अठारह वर्ष के युवक थे। उन्हें संकेत प्रशिक्षण के लिए महाराष्ट्र भेज दिया ही गया। लगभग 10 वर्ष तक सेना में सेवारत रहने के पश्चात् जनवरी, 1941 में युद्ध के लिए विदेश जाने से पूर्व अपने घरवालों से विदा लेने धर्मशाला गए, और वहीं (धर्मशाला) ठाकुर परिवार की कन्या शारदा देवी के साथ उनका विवाह हो गया। अप्रैल 1941 में दुर्गा मल्ल की टुकड़ी सिकन्दराबाद पहुंची जहां से उसे आगे विदेश रवाना होना था। 2/1 गोरखा बटालियन के अतिरिक्त अन्य गोरखा बटालियनें भी सिंगापुर पहुंच चुकी थीं। दिसम्बर 1941 में जापानियों ने दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में तैनात मित्र सेना पर हमला करके युद्ध की घोषणा कर दी।

इस बीच आजाद हिन्द फौज का गठन हुआ जिसमें तीन प्रमुख गोरखा बटालियनों की भूमिका रही थी। आजाद हिन्द फौज में पन्द्रह हजार अधिकारी और सिपाही थे। भारत को आजाद कराने के आह्वान पर दुर्गा मल्ल भी आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गए। इनकी कार्य कुशलता देखकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने दुर्गा मल्ल को गुप्तचर विभाग का कार्य भार सौंपकर कप्तान बनाया। बाद में उन्हें विशेष अभियान के लिए भारत-बर्मा सीमा पर नियुक्त किया। मणिपुर के उखरूल नामक स्थान पर 27 मार्च, 1944 के दिन मेजर दुर्गा मल्ल शत्रु के घेरे में फंस गए। दुर्गा मल्ल को युद्धबन्दी के रूप में दिल्ली में लालकिले के बन्दीगृह में रखा गया। इनके विरुद्ध सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया। 25अगस्त, 1944 को दुर्गा मल्ल को फांसी दी गई। और इस तरह उन्हें आजाद हिन्द फौज के प्रथम शहीद होने का गौरव प्राप्त हुआ।



Posted by Veer Grokha on 00:57. Filed under , , , , , . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Feel free to leave a response

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